नई दिल्ली। भारत की आज़ादी की लड़ाई में मोहम्मद अब्दुल क़ादिर का नाम जांबाज़ सिपाहियों में लिया जाता है। 25 मई 1917 को केरल के त्रिवेंद्रम ज़िले के बककम गाँव में जन्मे अब्दुल क़ादिर पर बचपन से ही आज़ादी का असर था। उनके वालिद खुद अंग्रेज़ी हुकूमत के ख़िलाफ़ काम करते थे।
युवावस्था में ही अब्दुल क़ादिर ने ग़दर पार्टी और बाद में इंडियन इंडिपेंडेंस लीग से जुड़कर आज़ादी की तहरीक में कदम रखा। बाबा उस्मान ख़ान की रहनुमाई में उन्हें कई अहम ज़िम्मेदारियाँ मिलीं, जिन्हें उन्होंने बहादुरी से निभाया। वह इंडियन नेशनल आर्मी के लिए युवाओं को तैयार करने और अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ ख़ुफ़िया मिशनों में शामिल रहे।
थाईलैंड और मलाया से लेकर हिंदुस्तान तक अब्दुल क़ादिर ने अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ सूचनाएँ पहुँचाईं। लेकिन एक मिशन के दौरान वह गिरफ़्तार हो गए। सिंगापुर की जेल में उन्हें और उनके साथियों को अमानवीय यातनाएँ दी गईं। हर मुश्किल के बावजूद उन्होंने कभी अपने राज़ नहीं खोले।
जेल में लगातार अत्याचार सहते हुए भी वह “सुभाषचंद्र बोस ज़िंदाबाद” और “हिंदुस्तान ज़िंदाबाद” के नारे लगाते रहे। अंततः 10 सितंबर 1943 को अंग्रेज़ी हुकूमत की यातनाओं के बीच उन्होंने शहादत हासिल की।
मोहम्मद अब्दुल क़ादिर का बलिदान आज़ादी की लड़ाई में हमेशा अमर बनाए रखेगा।
