संयुक्त राष्ट्र (यूएन) में सुधार बेहद ज़रूरी

संयुक्त राष्ट्र (United Nations) की स्थापना 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद हुई थी। उस समय इसका उद्देश्य था विश्व में स्थायी शांति स्थापित करना, युद्धों को रोकना, देशों के बीच संवाद बढ़ाना और मानवाधिकारों की रक्षा करना। लगभग 80 वर्षों की यात्रा में संयुक्त राष्ट्र ने कई महत्वपूर्ण कार्य किए हैं, जैसे शरणार्थियों की सहायता, शांति सैनिक भेजना, जलवायु परिवर्तन पर चर्चा, गरीबी उन्मूलन और अंतरराष्ट्रीय कानून की रक्षा। फिर भी आज की दुनिया में इसके ढांचे और कार्यप्रणाली को लेकर गहरे सवाल उठ रहे हैं। यही कारण है कि “यूएन में सुधार बेहद ज़रूरी” विषय पर चर्चा व्यापक हो रही है।

सबसे बड़ा मुद्दा है संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की संरचना। वर्तमान में इसमें पाँच स्थायी सदस्य (अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और ब्रिटेन) हैं, जिनके पास वीटो शक्ति है। यह व्यवस्था 1945 की विश्व राजनीति के हिसाब से बनी थी, जब औपनिवेशिक ताकतें और शीत युद्ध के दो ध्रुव हावी थे। लेकिन आज की दुनिया पूरी तरह बदल चुकी है। भारत, जापान, जर्मनी, ब्राज़ील जैसे बड़े और प्रभावशाली देश वैश्विक राजनीति में प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं, परंतु सुरक्षा परिषद में उन्हें स्थायी सदस्यता नहीं मिली है। इससे संयुक्त राष्ट्र की प्रतिनिधित्व क्षमता पर प्रश्नचिह्न लगता है।

दूसरी चुनौती है वीटो पावर का दुरुपयोग। स्थायी सदस्य अपनी राजनीतिक और सामरिक हितों के अनुसार कई बार प्रस्तावों को रोक देते हैं, चाहे वह मानवीय संकट से ही क्यों न जुड़ा हो। उदाहरण के लिए, सीरिया, गाज़ा या यूक्रेन के मामलों में अक्सर वीटो का प्रयोग किया गया है। इसका नतीजा यह हुआ कि संयुक्त राष्ट्र समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठा पाया और आम जनता को भारी नुकसान उठाना पड़ा।

इसके अलावा, संयुक्त राष्ट्र की कई एजेंसियों में भी पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी देखी जाती है। कई बार विकासशील देशों की आवाज़ अनसुनी कर दी जाती है, जबकि निर्णय लेने की प्रक्रिया पर अमीर और शक्तिशाली देशों का प्रभुत्व होता है। यही कारण है कि वैश्विक दक्षिण (Global South) लगातार अधिक प्रतिनिधित्व और न्यायपूर्ण व्यवस्था की मांग कर रहा है।

भारत का दृष्टिकोण इस बहस में अहम है। भारत न केवल दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है बल्कि तेजी से उभरती हुई अर्थव्यवस्था और शांति अभियानों में अग्रणी योगदानकर्ता भी है। भारत का मानना है कि यदि संयुक्त राष्ट्र को 21वीं सदी में प्रासंगिक बने रहना है तो उसे अपनी संरचना में सुधार करना होगा और वैश्विक शक्ति संतुलन को प्रतिबिंबित करना होगा।

अंततः कहा जा सकता है कि यदि संयुक्त राष्ट्र सुधार नहीं करता तो उसकी विश्वसनीयता और प्रभाव धीरे-धीरे कम होता जाएगा। दुनिया को आज जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद, आर्थिक असमानता और महामारी जैसी साझा चुनौतियों का सामना करना है, जिसके लिए एक मज़बूत, न्यायपूर्ण और प्रतिनिधिक अंतरराष्ट्रीय संस्था की आवश्यकता है। इसीलिए संयुक्त राष्ट्र में सुधार न केवल ज़रूरी है, बल्कि अनिवार्य है।

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