करिमगंज (असम):
गर्म धूप हो या बारिश से भीगी सड़कों पर कीचड़, एक रिक्शा धीरे-धीरे गाँव की गलियों से गुजरता था। उस रिक्शे की घंटी सिर्फ सवारी के लिए नहीं, बल्कि शिक्षा के उजाले की पुकार भी थी। यह कहानी है असम के करिमगंज ज़िले के अहमद अली की, जिन्होंने गरीबी से लड़ते हुए भी शिक्षा की मशाल जलाई और अपने दम पर 9 स्कूल खड़े कर दिए।
बचपन में छूटी पढ़ाई, बना दूसरों के लिए सपना
गरीबी के चलते अहमद अली खुद ज़्यादा पढ़ाई नहीं कर पाए। बचपन में ही उन्हें रोज़ी-रोटी के लिए संघर्ष करना पड़ा और बड़ा होते-होते वह रिक्शा चलाने लगे। मगर भीतर कहीं एक कसक रह गई | अगर शिक्षा न मिले, तो जिंदगी कितनी अधूरी रह जाती है! यही कसक उनके जीवन की दिशा बदल गई। उन्होंने ठान लिया कि गाँव का कोई बच्चा उनकी तरह अधूरा सपना लेकर न बड़ा हो।
जमीन बेचकर खोला पहला स्कूल
साल 1978, अहमद अली के जीवन का सबसे बड़ा मोड़। उन्होंने अपनी पुश्तैनी ज़मीन का हिस्सा बेच डाला और गाँववालों से मदद जुटाई। इसी मदद और हौसले से मदुरबाँद (Madhurband) गाँव में पहला स्कूल खुला। उस दिन से लेकर आज तक, अहमद अली रुकने वाले नहीं थे। हर दिन सुबह रिक्शा खींचना, रात में छोटे-मोटे काम करना और कमाई का बड़ा हिस्सा शिक्षा की ओर लगाना यही उनका जीवन बन गया।
9 स्कूलों का कारवां
आज, उनके दमखम और त्याग से 9 स्कूल खड़े हैं। 3 निचली प्राथमिक विद्यालय, 5 इंग्लिश मीडियम मिडिल स्कूल, 1 हाई स्कूल
इन स्कूलों में हज़ारों बच्चे पढ़ चुके हैं और कई सरकारी शिक्षक भी अब यहाँ पढ़ा रहे हैं। अहमद अली ने अपनी लगभग 32 बिग्घा ज़मीन तक शिक्षा के नाम पर बेच दी।
प्रधानमंत्री ने भी किया सलाम
अहमद अली की कहानी ने पूरे देश को छुआ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने कार्यक्रम “मन की बात” में उन्हें याद किया और कहा—“ये असली भारत के हीरो हैं, जिन्होंने अपने जीवन को समाज के लिए समर्पित कर दिया।”
आगे का सपना – एक जूनियर कॉलेज
अब जब उम्र 80 के पार पहुँच चुकी है, तब भी अहमद अली का सपना थमा नहीं है। वह चाहते हैं कि गाँव के बच्चे दसवीं के बाद पढ़ाई छोड़ न दें। इसके लिए वह अब अपने इलाके में एक जूनियर कॉलेज खोलने का सपना देख रहे हैं।
असली हीरो की पहचान
कोई शोहरत नहीं, कोई तामझाम नहीं सिर्फ शिक्षा की लगन। रिक्शा की पैडल पर दबे पसीने की बूँदों से जो सपनों की इमारत खड़ी हुई है, वह आज हज़ारों गरीब बच्चों को उजाला दे रही है।
अहमद अली, असम के रिक्शा चालक, आज साबित करते हैं कि हीरो वही नहीं होता जो परदे पर दिखे, बल्कि असली हीरो तो वो है, जो अपनी मेहनत और नीयत से समाज का भविष्य बदल दे।
