एनडीए की ऐतिहासिक जीत और लोकतांत्रिक प्रक्रिया? रणनीति, सामाजिक समीकरण और मतदाता वर्गों की बदली प्राथमिकताओं का परिणाम! – के. पी. मलिक

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के. पी. मलिक

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में एनडीए की ऐतिहासिक जीत ने राज्य की राजनीति में नई शक्ति-संतुलन और चर्चाओं को जन्म दे दिया है, जिसमें धांधली के आरोप भी लगे हैं, लेकिन अधिकतर विश्लेषकों ने इसे निर्णायक चुनावी रणनीति, सामाजिक समीकरण और मतदाता वर्गों की बदली प्राथमिकताओं का परिणाम करार दिया है।

सवाल है कि क्या एनडीए की यह प्रचंड जीत ‘ठगी’ है?

इसमे कोई शक नहीं है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में संदेह पैदा होना स्वाभाविक है, खासकर अप्रत्याशित बड़े परिणामों पर। इस बार चुनाव आयोग ने पारदर्शिता बढ़ाने के लिए कई कड़े कदम उठाए ईवीएम सुरक्षा, पोस्टल बैलेट काउंटिंग के नियम, मतदान केंद्र पर प्रतिनिधियों की निगरानी। अब तक किसी ठगी या धांधली के स्थापित प्रमाण नहीं मिले हैं, पहली बार है कि किसी मतदान केन्द्र पर पुनः मतदान की स्थिति नहीं बनी।

इस चुनाव में सामाजिक समीकरण और भाजपा की मजबूती ने अहम रोल अदा किया है। एनडीए ने परंपरागत जातीय समीकरणों से आगे निकल नए ‘महिला-युवा-ईबीसी’ (महिला, युवा, अत्यंत पिछड़ा वर्ग) गठजोड़ को साधा। भाजपा की नेतृत्वकारी छवि, नीतीश कुमार की योजनाएं (महिला रोजगार, वृद्धावस्था पेंशन, फ्री बिजली आदि) ने मतदाताओं को आकर्षित करने का काम किया। जातीय विविधता, तेज चुनावी अभियान और प्रवासी बिहारी मतदाताओं की भूमिका निर्णायक रही।

इस जीत से बिहार ही नहीं बल्कि पूरे देश में लोकतंत्र पर असर और संघ का विस्तार संभव है। एनडीए की जबरदस्त जीत से संघनिष्ठ ताकतों का दायरा और गहरा हो सकता है, जिससे केंद्र-राज्य संबंध एवं संघ की एजेंडा-निर्माणक्षमता बढ़ेगी। विपक्ष के लिए यह बम यानी झटका है महागठबंधन की घटती सीटें उसके राजनीतिक पुनर्गठन की मांग खड़ी करती हैं। यदि यह ट्रेंड जारी रहता है, तो लोकतंत्र में सत्ता का केंद्रीकरण, विपक्ष की आवाज का कमजोर होना और युवाओं, महिलाओं तथा मध्यम-वर्गीय शक्तियों की भागीदारी बढ़ने के बावजूद संभावित सामाजिक ध्रुवीकरण बढ़ सकता है।

दरअसल बिहार की इस जीत के बाद सांप्रदायिकता और विपक्ष की स्थिति में बदलाव देखने को मिल सकता है। भाजपा-संघ की मजबूती सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए संभावनाएं बना सकती है, खासकर जब विपक्ष कमजोर हो। विपक्ष की हार क्षेत्रीय दलों के लिए चेतावनी है कि जाति-मजहब आधारित राजनीति अब पर्याप्त नहीं; जमीन पर जन-आकांक्षा, विकास और युवा मुद्दे प्रमुख हैं।

बहरहाल, इस चुनावी परिणाम का सबसे बड़ा संदेश यह है कि बिहार की राजनीति नए वोट बैंक और रणनीतियों में स्थानांतरित हो रही है, जहां एनडीए की चुनाव-संचालन दक्षता, गठबंधन समन्वय और सामाजिक कल्याण कार्यक्रम निर्णायक बने। लंबे समय में इससे सत्ताधारी पार्टी का शिकंजा तो मजबूत होगा, लेकिन लोकतंत्र का स्वास्थ्य इस पर निर्भर करेगा कि विपक्ष व सामाजिक शक्तियां कितनी प्रभावी रूप से प्रतिवाद करती हैं और राज्य में सामाजिक समरसता कैसे कायम रहती है।

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