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– के. पी. मलिक
पश्चिम यूपी की शान “गठवाला खाप की पगड़ी” जो कभी जाट समाज की अस्मिता, अनुशासन और आत्मगौरव का प्रतीक हुआ करती थी। आज वही पगड़ी सियासी मंचों पर प्रदर्शन की वस्तु बन चुकी है या यूं कहें कि किसान यूनियनों और राजनीतिक दलों के लिए भीड़ जुटाने, ताली बजवाने और भ्रम बेचने का एक औजार भर रह गई है। बाबा हरकिशन मलिक से लेकर चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत के समय तक इस पगड़ी ने समाज को जोड़ने का बेहतरीन प्रयास करते हुए समाज को सम्मान दिलाने और सत्ता को झुकने पर मजबूर किया था।
मैंने वो दौर देखा है कि जब प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री तक के हेलीकाप्टर गन्ने के खेतों में उतारकर पैदल चलकर दोपहर की तपती धूप में टिकैत बाबा के सामने बैठते थे। लेकिन आज, जिन मंचों से कभी अन्याय के ख़िलाफ़ हुंकार उठती थी, वहीं अब झूठ, स्वार्थ और दिखावे के नारे गूंजते हैं। किसान आंदोलन का चरित्र अब जनहित नहीं, बल्कि निजी स्वार्थ, लाभ और राजनीतिक सौदेबाज़ी में सिमट चुका है।
दरअसल भारी मन से लिखना पड़ता है कि गौरवशाली गठवाला खाप, जो कभी अनुशासन और सिद्धांत की मिसाल रही है, आज सियासी नौटंकी का विषय बना दी गई है। जो खाप कभी समाज का नैतिक प्रहरी थी, आज वही राजनीतिक ठेकेदारों के हाथों की कठपुतली बन गई है। यह समाज के लिए विडंबना नहीं, शर्म से डूब मरने की बात है। क़रीब पिछले तीन दशकों में यह खेल बार-बार दोहराया जाता रहा है कि जब सियासत डगमगाई, तो यूनियन की आड़ ली गई; जब यूनियनें कमजोर पड़ीं, तो खाप का झंडा उठा लिया गया; और जब दोनों बेअसर हुए, तो जातीय पहचान को हथियार बना लिया गया। आज की सियासत में पगड़ी, झंडा और टोपी सब एक ही थैली के अंदर रख लिए गए हैं। वक्त और हालात देखकर निकाल लिए जाते हैं और भीड़ जुट जाने या स्वार्थ सिद्धि होने पर वापस रख दिए जाते हैं।
सत्ता की इस होड़ में हर नेता, हर यूनियन प्रमुख, हर मंच झूठ और छल के सहारे अपने-अपने सिंहासन गढ़ रहा है। प्रतिस्पर्धा ऐसी है कि हर कोई इस देश के जुमलेबाज़ प्रधानमंत्री को भी पीछे छोड़ने की कोशिश में है। इनकी जनसेवा का उद्देश्य अब बस एक साज-सज्जा की तरह सिर्फ़ दिखावा है क्योंकि मैंने इन अवसरवादियों को अपने तथाकथित आकाओ और कैमरे के सामने झुकने की मुद्रा और भाषणों में गढ़े गए आदर्श को बहुत बारीकी से देखा और समझा है। इशारा तो समझ ही गए होंगे?
लेकिन विडंबना यह है कि इस खोखले दिखावे की असली कीमत समाज चुका रहा है। हाल ही में फ़ीस न भर पाने के कारण उज्जल राणा नामक एक होनहार युवक ने आत्महत्या कर ली और यह त्रासदी केवल उसकी नहीं, हमारे पूरे समाज की विफलता का आईना है। उसकी मौत का दोष केवल सरकार पर नहीं, बल्कि उन नेताओं पर भी है जिन्होंने समाज की एकता को अपनी राजनीति की सीढ़ी बना लिया। गन्ना किसानों की लड़ाई के बहाने सरकार और मिल मालिकों को निचोड़ो और चुनाव के दौरान किसानों को बड़े सपने दिखाकर जुमलें सुना कर सत्ताधारी सियासी दलों को निचोड़ो। यही कारण है कि किसानों की समस्याओं को सरकार तक पहुँचाने के नाम पर फ़र्ज़ी किसान संगठन नामक दुकाने लगातार खुल रही हैं।
मैं आज भारी मन के साथ आहत होकर यह सोचने पर मजबूर होकर एक सवाल आप सब के लिए छोड़ रहा हूँ कि क्या हमारी परंपरा, आस्था और पहचान सिर्फ़ राजनीतिक प्रदर्शन की वस्तु बनकर रह जाएगी? या फिर हम एक बार फिर उस पगड़ी को उसके असली अर्थ, “सम्मान, अनुशासन और स्वाभिमान” के साथ सिर पर बाँध पाएँगे?
(लेखक दैनिक भास्कर के राजनीतिक संपादक हैं)
