भारत के अंतरिक्ष मिशन में निजी क्षेत्र की बड़ी उड़ान, ‘विक्रम-1’ ने रचा नया अध्याय

भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में अब निजी कंपनियां भी बड़ी भूमिका निभाने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही हैं। इसी कड़ी में हैदराबाद की स्पेस टेक कंपनी स्काईरूट एयरोस्पेस का ‘विक्रम-1’ बेहद अहम माना जा रहा है। निजी क्षेत्र में विकसित इस ऑर्बिटल रॉकेट का मकसद छोटे सैटेलाइट्स को अंतरिक्ष में लो अर्थ ऑर्बिट तक पहुंचाना है। इस मिशन के साथ भारत के निजी स्पेस सेक्टर के लिए एक नए दौर की शुरुआत के तौर पर इसे देखा जा रहा है।

स्काईरूट एयरोस्पेस के सह-संस्थापक पवन कुमार चंदना के मुताबिक, इस मिशन को ‘मिशन आगमन’ नाम दिया गया है। रॉकेट का नाम भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक विक्रम साराभाई के नाम पर रखा गया है।

छोटे सैटेलाइट्स को अंतरिक्ष तक पहुंचाने में सक्षम

विक्रम-1 को खास तौर पर छोटे सैटेलाइट्स को लो अर्थ ऑर्बिट में स्थापित करने के लिए डिजाइन किया गया है। फिलहाल इसकी पेलोड क्षमता 350 किलोग्राम है, जबकि कंपनी के मुताबिक भविष्य में इसे बढ़ाकर 500 किलोग्राम तक किया जाएगा।

यह रॉकेट 350 किलोग्राम तक के सैटेलाइट को लो अर्थ ऑर्बिट और 260 किलोग्राम तक के सैटेलाइट को सन-सिंक्रोनस ऑर्बिट में पहुंचाने में सक्षम है। कंपनी के अनुसार, यह सैटेलाइट को पृथ्वी की सतह से करीब 500 किलोमीटर की ऊंचाई तक ले जा सकता है।

विक्रम-1 का वजन करीब 40 टन है और इसकी ऊंचाई 20 मीटर यानी लगभग सात मंजिला इमारत के बराबर है। इसका डायमीटर 1.7 मीटर और थ्रस्ट क्षमता 1200 किलोन्यूटन बताई गई है।

इस रॉकेट की एक खास तकनीकी विशेषता इसका 3डी-प्रिंटेड लिक्विड इंजन है। कंपनी के मुताबिक, यह पारंपरिक इंजन की तुलना में 50 प्रतिशत हल्का है। वहीं, इसके सॉलिड फ्यूल बूस्टर कार्बन कंपोजिट स्ट्रक्चर से बनाए गए हैं।

छह तरह के पेलोड होंगे मिशन का हिस्सा

विक्रम-1 के जरिए छह तरह के पेलोड भेजे जा रहे हैं। इनमें भारत में निर्मित पांच पेलोड शामिल हैं, जबकि एक पेलोड जर्मनी की कंपनी डीक्यूबीईडी जीएमबीएच ने बनाया है। मिशन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का पोस्टकार्ड भी भेजे जाने की बात कही गई है।

विक्रम-एस से शुरू हुआ था सफर

स्काईरूट एयरोस्पेस ने इससे पहले 18 नवंबर 2022 को ‘विक्रम-एस’ नामक सबऑर्बिटल रॉकेट का सफल परीक्षण किया था। इसे भारत में किसी निजी कंपनी द्वारा लॉन्च किया गया पहला रॉकेट बताया गया है।

कंपनी के सह-संस्थापक पवन कुमार चंदना के मुताबिक, विक्रम-एस एक तरह का टेस्ट रॉकेट था। इसकी सफलता के बाद कंपनी ने करीब तीन साल में विक्रम-1 को तैयार किया।

स्काईरूट एयरोस्पेस की स्थापना 2018 में इसरो के पूर्व इंजीनियर पवन कुमार चंदना और नागा भरत डाका ने की थी। नवंबर 2025 में कंपनी ने हैदराबाद में दो लाख वर्ग फुट में फैला ‘इनफिनिटी कैंपस’ नाम का वर्कशॉप भी बनाया।

इसरो के रॉकेट्स से कितना अलग है विक्रम-1?

भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम में इसरो के पास पहले से पीएसएलवी, जीएसएलवी और एलवीएम3 जैसे लॉन्च व्हीकल हैं। इनमें पीएसएलवी छोटे और मध्यम आकार के सैटेलाइट्स को अलग-अलग ऑर्बिट में पहुंचाने के लिए इस्तेमाल होता है, जबकि जीएसएलवी और एलवीएम3 ज्यादा भारी सैटेलाइट्स को अंतरिक्ष में ले जाने की क्षमता रखते हैं।

विक्रम-1 की क्षमता इन बड़े लॉन्च व्हीकल्स की तुलना में काफी कम है। इसे मुख्य रूप से छोटे सैटेलाइट्स को लो अर्थ ऑर्बिट तक पहुंचाने के लिए तैयार किया गया है। ऐसे में इसका फोकस बड़े सैटेलाइट्स की जगह छोटे पेलोड वाले मिशनों पर है।

2027 में विक्रम-2 की तैयारी

स्काईरूट एयरोस्पेस ने विक्रम-1 के बाद ‘विक्रम-2’ लॉन्च करने की भी घोषणा की है। इसे 2027 में लॉन्च करने की योजना है। कंपनी के मुताबिक, विक्रम-2 की पेलोड क्षमता लो अर्थ ऑर्बिट में 900 किलोग्राम और सन-सिंक्रोनस ऑर्बिट में 600 किलोग्राम होगी। इसमें कार्बन कंपोजिट स्ट्रक्चर के साथ एडवांस क्रायोजेनिक इंजन का इस्तेमाल किए जाने की बात कही गई है।

तेजी से बढ़ रहा भारत का निजी स्पेस सेक्टर

भारत में निजी अंतरिक्ष क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार ने 2023 में भारतीय अंतरिक्ष नीति जारी की थी। सरकार के अनुसार, पिछले एक दशक में अंतरिक्ष क्षेत्र में 300 से अधिक स्टार्टअप शुरू हुए हैं।

2015 से 2024 के बीच इसरो ने 393 विदेशी और तीन स्वदेशी कमर्शियल सैटेलाइट लॉन्च किए, जिससे 439 मिलियन अमेरिकी डॉलर का राजस्व हासिल हुआ। वहीं, 2024 से भारतीय अंतरिक्ष क्षेत्र में 100 प्रतिशत तक फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट यानी एफडीआई की अनुमति दी गई है।

भारत की ग्लोबल स्पेस इंडस्ट्री में हिस्सेदारी 2021 में करीब 2 प्रतिशत यानी 8.4 अरब डॉलर थी। सरकार का अनुमान है कि 2033 तक भारत का अंतरिक्ष क्षेत्र 44 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है, जिसमें निर्यात का हिस्सा 11 अरब डॉलर तक होने का अनुमान है।

ऐसे में स्काईरूट का विक्रम-1 सिर्फ एक रॉकेट लॉन्च नहीं, बल्कि भारत के तेजी से उभरते निजी अंतरिक्ष उद्योग की बढ़ती क्षमता का भी संकेत है। आने वाले वर्षों में विक्रम-2 जैसे बड़े लॉन्च व्हीकल्स के साथ निजी कंपनियों की भूमिका और बढ़ने की उम्मीद है।

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