“जम्मू से कश्मीर घाटी तक: 1947 का सच और अधूरी कहानी”

सईद नकवी

(सुविख्यात पत्रकार सईद नकवी की पुस्तक Being the others ; muslim in India का हिंदी अनुवाद “वतन में पराया : हिंदुस्तान में मुसलमान” के अध्याय “कश्मीर का दर्द” का संक्षिप्त अंश)

3 जून, 1947 को 1947 को ब्रिटिश भारत को विभाजित कर भारत अधिराज्य (Dominion state) और पाकिस्तान अधिराज्य (Dominion state) दो भागों में बांटने की योजना ‘माउंटबेटन योजना’ का ऐलान हुआ। ‘भारत स्वतंत्रता अधिनियम’ के नाम से इसको ब्रिटिश क्राउन द्वारा मान्यता दी गई। ..

कश्मीर में विपरीत हवा बह रही थी। गोपाल स्वामी आयंगर को नेहरू के नेतृत्व में नयी सरकार (1947-1948 में) में मंत्री मंडल में बिना विभाग मंत्री के रूप में सम्मिलित किया गया) वे मंत्रिमंडल में कश्मीर मामलों में जवाहरलाल नेहरू के सहायक थे। (संविधान की प्रारूप समिति (Drafting committee) के भी सदस्य थे)। आयंगर 1937 से 1943 तक कश्मीर के प्रधान मंत्री रह चुके थे। उनकी ख्याति घोर मुस्लिम विरोधी मद्रासी ब्राह्मण के रूप में थी।..

उस वक्त यह एक बड़ा सवाल था कि देशी रियासतें (रजवाड़े) किसके साथ विलय का विकल्प चुनती हैं? पाकिस्तान या भारत? (15 अगस्त 1947 को ब्रिटिश सार्वभौम सत्ता Paramount Power का अंत हो जाने पर 565 देशी रियासतों में से हैदराबाद, कश्मीर तथा जूनागढ़ को छोड़कर अन्य सभी भारतीय संघ में सम्मिलित हो गई थी) हैदराबाद के निजाम चाहते थे स्वतंत्र रहें, लेकिन भारत ने सेना भेजकर हैदराबाद का भारत में विलय कर लिया गया। जूनागढ़ (गुजरात के सौराष्ट्र में पोरबंदर के निकट) के मुस्लिम शासक नवाब महाबत खानजी तृतीय पाकिस्तान के साथ जाना चाहते थे। पाकिस्तान ने उनके विलय के प्रस्ताव को स्वीकार भी कर लिया था। वहां की आबादी में बहुमत (लगभग 96 प्रतिशत) हिंदू था। इस आधार पर भारत ने जूनागढ़ कि आर्थिक नाकेबंदी की फिर समुद्री मार्ग (दक्षिण पश्चिम में अरब सागर के तट पर जूनागढ़ स्थित है) के माध्यम से पाकिस्तान की सेनाओं की दखलंदाजी की संभावना को आधार बनाकर नवंबर 1947 में भारतीय सेना ने जूनागढ़ पर कब्जा कर जनमत संग्रह (Plebiscite) कराया। इस तरह जूनागढ़ 20 फरवरी, 1948 को भारत में सम्मिलित किया गया।

सवाल था कि कश्मीर का क्या किया जाए?

जम्मू और कश्मीर दोनों सूबों को मिलाकर वहां की कुल आबादी में 77 प्रतिशत मुसलमान थे। इसमें हिंदू और सिख कश्मीर की तुलना में जम्मू में अधिक थे। इसके बावजूद जम्मू में भी मुस्लिम आबादी बहुमत (61.4 प्रतिशत) थी। कश्मीर के महाराजा हरिसिंह की इच्छा पाकिस्तान के साथ जाने की नहीं थी। वे चाहते थे जम्मू को कश्मीर से अलग कर भारत में सम्मिलित कर लिया जाए। शेष कश्मीर में जूनागढ़ की तरह जनमत संग्रह करा लिया जाए। हरिसिंह पर आरोप लगाया जाता है कि उनका इरादा था कि जम्मू में जनसांख्यिकी का प्रतिशत बदलकर इसे हिंदू बाहुल्य क्षेत्र में परिवर्तित कर दिया जाए। योजना थी कि जम्मू से मुस्लिम आबादी के बड़े हिस्से को मार-खदेड़ कर पाकिस्तान रवाना कर दिया जाए। इस योजना पर अमल किया गया और इस तरह जम्मू हिन्दू बहुल क्षेत्र बन गया; लेकिन कश्मीर की स्थिति विवादास्पद हो गई। पाकिस्तान अड़ गया कि यह रियासत मुस्लिम बाहुल्य (77 प्रतिशत मुस्लिम) होने के कारण इसका विलय पाकिस्तान में होना चाहिए। (जूनागढ़ की तरह जनमत संग्रह Plebiscite करा लिया जाए!) ..

जुलाई 1947 में दिल्ली में चर्चा होने लगी थी कि महाराजा हरिसिंह भारत में सम्मिलित होने के लिए सहमत हो चुके हैं।.. माउंटबेटन योजना की घोषणा के बाद महाराजा हरि सिंह पर कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों के नेताओं की ओर से विलय के लिए दबाव डाला जा रहा था। इस पृष्ठभूमि में गांधी जी ने 1 अगस्त को श्रीनगर का दौरा किया और महाराजा हरिसिंह से मुलाकात की। हालांकि उन्होंने कहा था कि वे किसी राजनीतिक मकसद से कश्मीर नहीं आए हैं, महाराज हरि सिंह से कश्मीर आने का वादा किया था, उसे पूरा करने के लिए ही कश्मीर आए हैं। बहरहाल, स्पष्ट संकेत थे कि गांधी जी ने महाराज को सलाह दी थी कि रियासत का विलय भारत संघ में कर दें। गांधी जी जम्मू होके 3 जून को दिल्ली लौटे।

पुंछ जागीर में किसान विद्रोह (15 जून, 1947 में लगान और बेदखली के विरोध से शुरु) पुंछ क्षेत्र में भंग की गई सेना के सिपाही बगावत में शरीक हो गए थे।.. (द्वितीय विश्वयुद्ध में 60 हजार सैनिक पुंछ से भर्ती हुए थे जो युद्ध समाप्त होने के बाद बेरोजगार हो गए थे।) अक्टूबर तक जम्मू उसके आसपास इलाकों तक इस विद्रोह की खबर पहुंचने लगी। (पुंछ की आबादी में 90 प्रतिशत मुस्लिम थे)। मुसलमानों को आतंकित करके पाकिस्तान जाने के लिए कहा जाने लगा। महाराजा के अधिकारियों ने सिख और हिंदू बहुल स्थानों को अलग करना प्रारंभ कर दिया। (मीरपुर और मुजफ्फराबाद और पुंछ का बड़ा भाग जो अब पाक अधिकृत कश्मीर का हिस्सा है, भौगोलिक रूप से पाकिस्तान के कबीलाई सीमा प्रांत खैर पख्तूनख्वा और पंजाब के सीमावर्ती हैं।).. यहां पश्चिम हिस्से से पठान कबाइलियों के आने से समस्या उलझती गई। (विद्रोह के कारण पुंछ पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर और भारत के जम्मू और कश्मीर में विभाजित हो गया) 1947-1948 के भारत-पाकिस्तान युद्ध का एक प्रमुख कारण यह था।

ब्रिटिश स्वामित्व वाले ‘द स्टेट्समैन’ समाचार पत्र ने 28 अक्टूबर, 1947 में “डेंजरस मूव” शीर्षक से प्रकाशित संपादकीय में कहा, “कश्मीर का मसला छोटा या सरल बिल्कुल नहीं है। यह रियासत इस देश की सबसे बड़ी रियासत है। भू-सामरिक दृष्टि से भी इसका असाधारण महत्व है। यदि, जैसा कि सबूत बताते है, पिछले हफ्ते हथियारबंद गिरोहों ने पश्चिमी हिस्से में घुसपैठ की, पाकिस्तान के अधिकारियों का समर्थन उनको हासिल था, तो यह अत्यंत अशोभनीय और शर्मनाक है। यह कृत्य दोनों अधिराज्य के लिए स्थायी दर्द बन जाएगा। यदि पठानों के हमलों में पाकिस्तान का हाथ होने के आरोप में कोई सच्चाई है, तो यह उनकी जबरदस्त नासमझी है, इसका तात्कालिक प्रभाव क्या होगा इसे पहले से समझ लेना कठिन न था। यह तय है कि पाकिस्तान सरकार कभी नहीं चाहती थी कि कश्मीर दरबार भारत की बाहों में चला जाए।’।”

“इस प्रकार की गंभीर किस्म की गलतफहमियों के संभावित नतीजा.. विशाल आबादी वाले इस उपमहाद्वीप की दुख:-तकलीफ और आपसी कलह को बढ़ाने में ही मददगार होगा। कश्मीर का भारत संघ में विलय इस लिखित वादे के साथ हुआ है कि भारत स्वेच्छा से अपनी सेना सहित प्रभाव क्षेत्र से लौट जाएगा। इसके बावजूद कश्मीर के भारत में विलय.. में वास्तविकता को नजरअंदाज किया गया है। क्या भारत के लिए यह मुमकिन है कि वह पूरी तरह संलिप्त हुए बिना, कश्मीर में आंतरिक शांति कायम कर सकता है। पंजाब में पंजाब में शरणार्थियों की समस्या के कारण स्थिति काफी विकट है। ऐसे में नए संरक्षित (कश्मीर) में , जहां घुसपैठ गंभीर वास्तविकता है, आसानी से शांति-व्यवस्था कायम करना किस तरह मुमकिन है। यह ठीक है, हवाई परिवहन की वजह से दुर्गम पर्वतीय प्रदेशों में पहुंच आसान हो गई है। एक तथ्य यह भी है कि भारत का सशस्त्र सैन्य बल पाकिस्तान की तुलना में काफी अधिक और सशक्त होने के बावजूद, लंबे सीमा क्षेत्र में फैला हुआ है; यह भी तथ्य है कि भारत की सेना पाकिस्तान की तुलना में विभाजित और असंगठित है।”

“जनमत संग्रह का विकल्प हालांकि जूनागढ़ में सही तौर पर प्रयुक्त किया गया परंतु कश्मीर के लिए जनमत संग्रह की बातें सैद्धांतिक तौर पर आकर्षक हैं, व्यवहार में इसका कोई खास अर्थ नहीं है। जनमत संग्रह जैसे समाधानों के लिए ज्यादा व्यवस्थित स्थिति की दरकार होती है, अन्यथा पूरी निष्पक्षता और शांति से इसे संपन्न कराना दुष्कर है।”

जम्मू में हुई हत्याओं के बारे में आधिकारिक आंकड़ों की अनुपलब्धता की स्थिति में ब्रिटिश पत्र-पत्रिकाओं में छपी रिपोर्ट देखना होगा। “द स्पेक्टेटर” के 16 जनवरी, 1948 के अंक में होरेंस अलेक्जेंडर के लेख काफी चर्चित है। इसमें मारे जाने वाले लोगों की संख्या 2 लाख बताई गई है। “द टाइम्स लंदन” के 10 अगस्त, 1948 के अंक में प्रकाशित एक रिपोर्ट में बताया गया है, “खुद महाराजा और उनके हिंदू व सिख सहायकों की अगुवाई में डोगरा रेजिमेंट ने 2 लाख 37 हजार मुसलमानों को पूरी तरह से नेस्तनाबूद कर दिया था। उन्हें पाकिस्तान के क्षेत्र में खदेड़ दिया गया था। यह जनसंहार 1947 में पठानों के हमले के पांच दिन पहले और महाराजा हरिसिंह द्वारा जम्मू व कश्मीर के भारत में विलय के नौ दिन पहले अंजाम दिया गया था। प्रवासन के परिणाम स्वरूप, जम्मू क्षेत्र में मुस्लिम आबादी जो वहां बहुसंख्यक (61.4 प्रतिशत) थी अल्पसंख्यक बन गई।”

आरएसएस के समर्थन से महाराजा हरिसिंह की भागीदारी का सबूत जवाहरलाल नेहरू का वह पत्र है जो उन्होंने वल्लभ भाई पटेल को 17 अप्रैल, 1949 को लिखा था (फ्रंटियर पत्रिका से उद्धृत) :

“इस (गुप्तचर विभाग की) रिपोर्ट में, अन्य बातों के अलावा जम्मू प्रांत में एक हिंदू आंदोलन का संदर्भ है, जिसे क्षेत्रीय जनमत संग्रह कहा जा रहा है। इस विचार का आधार यह है कि अगर संपूर्ण कश्मीर रियासत में जनमत संग्रह होता है तो नाकामी यकीनी है। इसलिए कम से कम जम्मू को तो बचा लिया जाए। आपको याद होगा कुछ माह पहले महाराजा द्वारा इस तरह के कुछ प्रस्ताव पेश किए गए थे। मुझे लगता है इस प्रकार का प्रचार बेहद हानिकारक है, निश्चित है कि इसमें हानि हमारी ही होगी। भविष्य में जो भी हो, मुझे नहीं लगता जम्मू प्रांत हमारे हाथ से निकल जाएगा। अगर हम यह चाहते हैं कि सिर्फ जम्मू प्रात ही हमें मिले और शेष कश्मीर रियासत पाकिस्तान के सुपुर्द कर दी जाए, तो निस्संदेह कुछ दिनों में यह हासिल हो सकता है। लेकिन हम कश्मीर घाटी के लिए संघर्ष कर रहे है।”

“क्षेत्रीय जनमत संग्रह के लिए जम्मू और दिल्ली आदि में प्रचार चल रहा था। ‘जम्मू प्रजा परिषद’ (आरएसएस से संबंधित) यह प्रचार कर रही है। हमार इंटेलिजेंस अधिकारी ने बताया है कि इस प्रजा परिषद को महाराजा द्वारा धन उपलब्ध कराया गया है। महाराज द्वारा नियंत्रित इस फंड के लिए बड़ी रकम एकत्र की गई है। यह रकम इस प्रचार के लिए प्रयुक्त की जा रही है।”
(संदर्भ : A.G. Noorani: ‘Why Jammu Erupts’, Frontline, volume 25, issue 19,september, 2008’)

महात्मा गांधी ने 25 दिसंबर, 1947 को जम्मू के हालात पर कहा था, “जम्मू में हिंदुओं, सिखों और बाहर से आए लोगों ने मुसलमानों की हत्या की है। वहां जो कुछ हो रहा है उसके लिए महाराजा जिम्मेदार हैं.. मुस्लिम महिलाओं का अपमान किया गया है।”(गांधी समग्र, खंड 90)

प्रस्तोता : कमल सिंह

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