हिंदुस्तान की आज़ादी की तहरीक़ में महिलाओं ने बे-मिसाल क़ुर्बानियाँ दीं। इन्हीं में से एक नाम है सुग़रा ख़ातून का। बिहार के आज़ादी के जलसों और आंदोलनों में वह हमेशा सक्रिय रहीं। वह सरोजिनी नायडू, श्रीमती मोतीलाल नेहरू जैसी ही दूसरी बहादुर ख़्वातीन के जनाना जलसो में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती थीं।
सुग़रा ख़ातून ने सिर्फ़ आज़ादी के नारों तक ख़ुद को सीमित नहीं किया, बल्कि ब्रिटिश हुकूमत के ख़िलाफ़ होने वाले आंदोलनों में प्रत्यक्ष तौर पर शामिल रहीं।
उनका सबसे बड़ा योगदान यह था कि उन्होंने औरतों में जागरूकता पैदा की। उन्होंने साबित किया कि औरतें भी पुरुषों की तरह जेल जा सकती हैं, आंदोलन में क़दम से क़दम मिला सकती हैं और आज़ादी की लड़ाई में अहम किरदार अदा कर सकती हैं।
ख़िलाफ़त आन्दोलन में औरतों के जनाना जलसो की रूह बनी सुगरा खातून का लखनऊ में 1968 में जुमे के दिन इंतिक़ाल हो गया |
सुग़रा ख़ातून की यह बहादुरी और जज़्बा आने वाली पीढ़ियों के लिए हमेशा प्रेरणा का स्रोत रहेगा। वह इस बात की मिसाल हैं कि हिंदुस्तान की नारी शक्ति ने भी आज़ादी की जद्दोजहद में किसी तरह की क़सर नहीं छोड़ी।
