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हिंदुस्तान की पहली जंग-ए-आज़ादी 1857 में कई ऐसे नाम उभरे जिन्होंने अंग्रेज़ी हुकूमत की बुनियाद हिला दी। उन्हीं में एक थे अज़ीमुल्ला ख़ान, जो अपनी सूझबूझ और बहादुरी के लिए हमेशा याद किए जाते हैं।
गोरखपुर के रहने वाले अज़ीमुल्ला ख़ान अंग्रेज़ी और फ़्रांसीसी ज़बानों पर क़ाबू रखते थे। उनकी इसी काबिलियत की वजह से नाना साहेब पेशवा ने उन्हें अपना मंत्री बनाया। 1854 में उन्हें इंग्लैंड भेजा गया ताकि ईस्ट इंडिया कंपनी के अन्याय के ख़िलाफ़ ब्रिटिश हुकूमत से गुहार लगा सकें। मिशन भले ही कामयाब न हुआ, लेकिन उन्होंने वहाँ से ही हिंदुस्तान की आज़ादी की जंग की रणनीति बनाने का फ़ैसला किया।
वापस लौटने के बाद अज़ीमुल्ला ख़ान ने नाना साहेब और रंगो बापू जैसे क्रांतिकारियों के साथ मिलकर 1857 की जंग का पूरा प्लान तैयार किया। वह जंग की प्लानिंग कमेटी के अहम ओहदेदार बने। उनकी डायरियों से साबित होता है कि उन्होंने इलाहाबाद, गया, जनकपुर, नासिक, रामेश्वरम, महाराष्ट्र और कई जगहों पर क्रांतिकारियों से मुलाक़ात की और आंदोलन को मज़बूत किया।
4 जून 1857 को कानपुर में गूँजे इंक़लाबी नारों और फहराए गए झंडे में अज़ीमुल्ला ख़ान की सोच और नेतृत्व की गहरी छाप थी। जुलाई में अंग्रेज़ों की भारी फ़ौज और हथियारों के सामने हिंदुस्तानी बहादुरों को हार झेलनी पड़ी, लेकिन अज़ीमुल्ला ख़ान आख़िरी दम तक लड़े और कभी अंग्रेज़ों के आगे सिर नहीं झुकाया।
उनकी कुर्बानियाँ और जज़्बा हमेशा याद दिलाता है कि आज़ादी की जंग सिर्फ़ तलवार से नहीं, बल्कि हिम्मत, हिकमत और हौसले से भी लड़ी गई थी।
