युवाओं ने किया धरना स्थगित, लेकिन चेतावनी दी, अगर वादे पूरे नहीं हुए तो सड़कों पर लौटेंगे

देहरादून: उत्तराखंड में स्नातक स्तरीय परीक्षा के प्रश्नपत्र लीक होने के विवाद ने सरकार को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया है। नौ दिनों तक बेरोज़गार युवाओं ने देहरादून के परेड ग्राउंड से सटी सड़क पर धरना दिया, जिसके बाद मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने पेपर लीक की जांच सीबीआई से कराने और छात्रों पर दर्ज मुक़दमे वापस लेने का ऐलान किया। छात्रों को इसके लिए अपनी सूची सरकार को सौंपनी होगी।

शुरुआत में मुख्यमंत्री ने इस घटना को “नकल जिहाद” कहकर अलग रंग देने की कोशिश की थी, लेकिन व्यापक विरोध के बाद सरकार को अपना रुख़ बदलना पड़ा। बेरोज़गार संघ के अध्यक्ष राम कांडवाल ने बीबीसी को बताया कि सीबीआई जांच और मुक़दमे हटाने की मांगें मान ली गई हैं, जबकि परीक्षा रद्द करने पर अंतिम फैसला सात से दस दिन में लिया जाएगा। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर सरकार वादों पर अमल नहीं करती, तो युवा पहले से दस गुना बड़ी संख्या में फिर सड़कों पर उतरेंगे।

पूर्व मुख्यमंत्री और हरिद्वार से बीजेपी सांसद त्रिवेंद्र सिंह रावत ने भी युवाओं के पक्ष में बयान दिया। उन्होंने कहा, “हमारे बच्चे बहुत अच्छे हैं और जिस तरह से उन्होंने यह आंदोलन किया, वह अपने आप में ऐतिहासिक है।”

21 सितंबर को हुई परीक्षा के महज 35 मिनट बाद पेपर लीक की पुष्टि के साथ ही आंदोलन शुरू हुआ। यह कोई नई घटना नहीं है—2003 से राज्य में विभिन्न भर्ती परीक्षाओं में भ्रष्टाचार और गड़बड़ी के मामले लगातार सामने आते रहे हैं।

सरकार का दावा कि पिछले चार साल में 25,000 युवाओं को नौकरी दी गई, बेरोज़गार संघ ने खारिज कर दिया। संघ के अनुसार केवल 2,745 स्थायी पदों पर नियुक्ति हुई, 6,250 पद संविदा पर और 8,498 पदों पर भर्ती प्रक्रिया जारी है।

आंदोलन को लेकर सोशल मीडिया पर अफ़वाहें फैलाई गईं, लेकिन आम जनता और विपक्ष ने युवाओं का समर्थन किया। कांग्रेस ने धामी की घोषणा को जनता को गुमराह करने वाला कदम बताया और 3 अक्टूबर को अपना आंदोलन जारी रखने की बात कही।

फिलहाल युवाओं ने धरना स्थगित कर दिया है, लेकिन उन्होंने साफ़ कहा कि अगर वादों पर अमल नहीं हुआ तो वे फिर से सड़कों पर उतरेंगे। साल 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले यह मुद्दा बीजेपी के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।

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