नृत्य से सामाजिक न्याय तक: ज़ाकिर हुसैन की प्रेरक सफलता कहानी

सलेम के एक छोटे से घर में अकेले नाचता एक बच्चा—जो अपने माता-पिता के लिए चिंता का कारण था—आज तमिलनाडु के सबसे सम्मानित भरतनाट्यम कलाकारों में गिना जाता है। यह कहानी है ज़ाकिर हुसैन की, जिन्होंने परंपराओं, सामाजिक दबावों और पहचान की चुनौतियों को पार कर अपनी अलग पहचान बनाई।

एक पारंपरिक उर्दू-भाषी मुस्लिम परिवार में जन्मे ज़ाकिर हुसैन का परिवार तेलंगाना से तमिलनाडु आया था। घर में उर्दू और बाहर तमिल—दो भाषाओं और संस्कृतियों के बीच पले-बढ़े ज़ाकिर को बचपन से नृत्य का शौक था, लेकिन उनके पिता को यह पसंद नहीं था। समाज की अपेक्षाओं के अनुसार उन्होंने कंप्यूटर साइंस में डिग्री ली, पर मन को सुकून नहीं मिला।

20 वर्ष की उम्र तक बिना किसी औपचारिक नृत्य प्रशिक्षण के ज़ाकिर घर छोड़कर चेन्नई पहुंच गए। मकसद सिर्फ़ एक था—नृत्य सीखना। संघर्ष के दिनों में उन्होंने होटल में नौकरी की और प्रसिद्ध भरतनाट्यम नृत्यांगना चित्रा विस्वेस्वरन से मिलने की कोशिश करते रहे। आखिरकार मुलाकात हुई। चित्रा विस्वेस्वरन ने उन्हें बिना फीस प्रशिक्षण दिया और हर महीने 250 रुपये का वजीफा भी दिया।

परिवार के विरोध के बीच ज़ाकिर ने विवाह नहीं किया और लगभग 14 साल विदेशों कनाडा, स्विट्ज़रलैंड और जर्मनी में बिताए, जहां उन्होंने भारतीयों को नृत्य सिखाया और अंतरराष्ट्रीय पहचान हासिल की। लंबे समय तक एक पुरुष मुस्लिम शास्त्रीय नर्तक होने के बावजूद उन्हें खास भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ा।

आज 55 वर्ष की उम्र में ज़ाकिर हुसैन न सिर्फ़ एक प्रसिद्ध भरतनाट्यम कलाकार हैं, बल्कि तमिलनाडु के कला एवं संस्कृति विभाग के मानद निदेशक भी हैं। हालांकि वे मानते हैं कि हाल के वर्षों में कला और संस्कृति का क्षेत्र गिरावट के दौर से गुजर रहा है। दर्शक कम हो गए हैं और कार्यक्रम छोटे होते जा रहे हैं।

इन्हीं अनुभवों के बीच ज़ाकिर हुसैन ने राजनीति में कदम रखा और डीएमके से जुड़ गए। उनका कहना है कि यहां उन्हें सामाजिक न्याय, सम्मान और सुरक्षा मिली। नृत्य से शुरू होकर सामाजिक न्याय तक पहुंची ज़ाकिर हुसैन की यह यात्रा संघर्ष, साहस और सफलता की एक प्रेरक मिसाल है।

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