कब्ज़े वाले यरुशलम में हालात अब सिर्फ़ “सुरक्षा” तक सीमित नहीं दिखते, बल्कि ज़मीन और पहचान दोनों को लेकर खींचतान खुलकर सामने आ रही है। Al-Aqsa Mosque लगातार 32 दिनों से बंद है। नमाज़ियों की एंट्री पूरी तरह रोकी गई है! यानी एक ऐसा कदम जिसे दशकों में सबसे लंबी पाबंदी बताया जा रहा है।
यह सख्ती ऐसे वक्त में बढ़ी है जब Passover नज़दीक है। पुराने शहर में भारी सुरक्षा तैनाती, चेकपॉइंट्स और सीमित आवाजाही ये सब मिलकर एक ऐसा माहौल बना रहे हैं, जहां इबादत से ज़्यादा नियंत्रण नज़र आता है।
इसी बीच, Bab al-Rahma cemetery में बसने वालों द्वारा तालमुदिक रस्में अदा करना वो भी सुरक्षा घेरे में, तनाव को और गहरा करता है। अब सवाल ये उठता है कि क्या ये सिर्फ़ धार्मिक गतिविधियाँ हैं, या किसी बड़े बदलाव की भूमिका?
रिपोर्ट के मुताबिक़, कुछ टेंपल-समर्थक समूह मस्जिद परिसर में “पासओवर बलि” जैसे प्राचीन अनुष्ठानों को दोबारा शुरू करने की कोशिश में हैं। इसके लिए आर्थिक प्रोत्साहन तक दिए जा रहे हैं! यानी आस्था अब सिर्फ़ विश्वास नहीं, बल्कि एक सुनियोजित रणनीति का हिस्सा बनती दिख रही है।
इसके अलावा “रेड हीफर्स” का मुद्दा भी अचानक तेज़ हो गया है। कुछ समूह इसे मंदिर निर्माण से जोड़ते हैं और इसके लिए विशेष धार्मिक शुद्धिकरण को ज़रूरी बताते हैं। हाल के महीनों में इन गायों के पालन-पोषण को लेकर बढ़ती गतिविधियाँ इसी दिशा की ओर इशारा करती हैं।
और इसके ही आपको बता दे की सिर्फ़ अल-अक्सा ही नहीं, Church of the Holy Sepulcher भी बंद है। यानी असर एक धर्म तक सीमित नहीं बल्कि पूरा धार्मिक परिदृश्य दबाव में है।
इज़राइली पुलिस ने संकेत दिया है कि ये पाबंदियाँ मध्य अप्रैल तक जारी रह सकती हैं। स्थानीय संस्थाएँ इसे एक बड़े बदलाव की प्रक्रिया मान रही हैं, जहां धीरे-धीरे नियंत्रण और स्वरूप दोनों बदले जा रहे हैं।
सबसे अहम बात रमज़ान के दौरान भी फ़िलिस्तीनियों को अल-अक्सा में नमाज़ से रोका गया, यहाँ तक कि ईद की नमाज़ भी नहीं हो सकी। ये सिर्फ़ एक प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि एक ऐसा संकेत है जो आने वाले समय की दिशा दिखाता है।
यरुशलम में अब सवाल सिर्फ़ सुरक्षा का नहीं रहा सवाल ये है कि क्या शहर की पहचान धीरे-धीरे नए सांचे में ढाली जा रही है?
