ग़ाज़ा की पीड़ा की तस्वीर मुझे आज भी झकझोर देती है: UNRWA प्रमुख लज़ारिनी

फ़िलिपे लज़ारिनी, फ़लस्तीनी जन के लिए संयुक्त राष्ट्र की सहायता एजेंसी (UNRWA) के प्रमुख के रूप में अपना दूसरा कार्यकाल पूरा करते हुए, ख़ासे दुखी नज़र आए. सौम्य स्वभाव के अनुभवी मानवतावादी कार्यकर्ता फ़िलिपे लज़ारिनी से इस मोड़ पर यह पूछना कि वे कैसा महसूस कर रहे हैं, शायद एक अनुचित प्रश्न है.

वह कहते हैं, “इसमें कोई शक नहीं कि आज मेरी भावनाएँ मिली-जुली हैं. कड़वाहट का अहसासहै, क्योंकि पिछले दो वर्षों में मैंने अन्तरराष्ट्रीय क़ानून के असाधारण उल्लंघन, अत्याचार और संयुक्त राष्ट्र पर हमलों को क़रीब से देखा है. मेरे भारत उदासी है, क्योंकि हमारे कई सहकर्मी मारे गए हैं – दो साल में लगभग 400 कर्मियों की मृत्यु, जोकि संयुक्त राष्ट्र के पूरे इतिहास में पहले कभी नहीं देखी गई.”

“मगर, कुछ गर्व भी है, क्योंकि पिछले दो वर्षों में मैंने देखा है कि हमारे कर्मचारी किस तरह, अपने समुदायों की पीड़ा को कम करने के लिए असाधारण रूप से प्रतिबद्ध रहे हैं.”

7 अक्टूबर 2023 के बाद के हालात

62 वर्षीय स्विस नागरिक फ़िलिपे लज़ारिनी, ग़ाज़ा में हमास लड़ाकों के साथ मिलीभगत के ऑनलाइन आरोपों और निरन्तर आलोचनाओं का सामना करने वाली संस्था (UNRWA) का चेहरा रहे हैं. साथ ही उन्होंने, अक्टूबर 2023 में इसराइल में हमास के नेतृत्व वाले आतंकी हमलों के बाद, ग़ाज़ा के लोगों और एजेंसी (UNRWA) पर इसराइली युद्ध के विनाशकारी प्रभाव को भी देखा है.

UNRWA के ख़िलाफ़ आरोपों की उच्च स्तरीय संयुक्त राष्ट्र जाँच में पाया गया कि आतंकी हमलों में शामिल होने के अभियुक्त 19 कर्मचारियों में से एक के ख़िलाफ़ कोई सबूत नहीं मिला और नौ अन्य के ख़िलाफ़, संलिप्तता के पर्याप्त सबूत नहीं थे. शेष नौ मामलों में, सबूतों से संकेत मिले कि कर्मचारी 7 अक्टूबर के हमलों में शामिल हो सकते थे, जिसके बाद एजेंसी ने उन्हें बर्ख़ास्त करने की घोषणा की.

आज, पूरे ग़ाज़ा पट्टी में दुख और मौत का सिलसिला जारी है. 

फ़िलिपे लज़ारिनी के लिए, अंगोला से लेकर इराक़ और सोमालिया से लेकर दक्षिण सूडान तक दुनिया भर के युद्धग्रस्त क्षेत्रों में काम करने के लम्बे अनुभव के बावजूद, युद्ध के शुरुआती दिनों की एक घटना को भूलना विशेष रूप से कठिन है.

बच्ची की आँखों में तैरती भूख

“मैंने ग़ाज़ा युद्ध भड़कने के चार सप्ताह बाद, रफ़ाह में एक बच्ची को देखा था. मैंने उसकी पथराई आँखों में पानी के एक घूँट और रोटी के एक टुकड़े के लिए भीख मांगते देखा, वह भी उस स्कूल में जहाँ वह कभी छात्रा थी. वह स्कूल, जिसे ख़ुशी और शिक्षा का स्थान होना चाहिए था, वही स्थान इन लड़कियों के लिए दुख और शरण का स्थान बन गया था. मुझे कहना  चाहता हूँ कि वह दृश्य मुझे आज भी झकझोर देता है.”

हालाँकि आज हमास और इसराइल के बीच ग़ाज़ा में युद्धविराम है, लेकिन उनका तर्क है कि यह “केवल नाम के लिए” है, क्योंकि लोग अब भी मारे जा रहे हैं और लोगों को नहीं मालूम कि उनके और इसराइली सेना के बीच सीमा कहाँ है, जोकि लगातार बदलती रहती है.

फ़िलिपे लज़ारिनी कहते हैं, “यह दुख के सिवा और कुछ नहीं है. हमने ग़ाज़ा में गहराती भूख के ज्वार को शायद मोड़ दिया हो, लेकिन इसके अलावा कुछ नहीं बदला. लोग अब भी मलबे में रह रहे हैं, साफ़ पानी के लिए घंटों इन्तज़ार कर रहे हैं और बीमारियों से जूझ रहे हैं.”

कोई वास्तविक विकल्प नहीं

फ़िलिपे लज़ारिनी ऐसी पीड़ा के बीच, इन सुझावों को ख़ारिज करते हैं कि कोई अन्य संस्था, UNRWA की जगह ले सकती है. वे ज़ोर देकर कहते हैं, “ग़ाज़ा में आपके पास कोई मौजूदा विकल्प नहीं है.” 

“जब सार्वजनिक स्वास्थ्य और शिक्षा सेवाओं की बात आती है, तो UNRWA ही एकमात्र संगठन है जिसके पास जनशक्ति, विशेषज्ञता और सामुदायिक विश्वास है. कोई अन्य सहायता संगठन (NGO) या यूएन संगठन ऐसा नहीं है. हम यह भी जानते हैं कि फ़लस्तीनी प्राधिकरण इन सेवाओं को संभालने के लिए तैयार नहीं है.”

ख़त्म होता संचालन वित्त

एजेंसी ने सेवाओं में कटौती और अधिकांश स्थानीय कर्मचारियों के वेतन में 20 प्रतिशत की कटौती जैसे किफ़ायती क़दम भी उठाए, मगर इसके बावजूद, महासभा अध्यक्ष को लज़ारिनी की यह चेतावनी अब भी प्रासंगिक है कि नक़दी के बिना UNRWA “जल्द ही कारगर नहीं बचेगी”.

वे समझाने के रूप में बताते हैं, “UNRWA पर हमले कोई अपवाद नहीं हैं. यदि हम इस एजेंसी के लिए इन हमलों बर्दाश्त करते हैं, तो अन्य एजेंसियों या संगठनों को भी ऐसे ही हमलों का निशाना बनाया जाएगा. ग़ाज़ा में यही हुआ: इस एजेंसी के ख़िलाफ़ कार्रवाई को सही ठहराने के लिए यूएन एजेंसियों पर, हमास की घुसपैठ होने का आरोप लगाया गया… और अब हम लेबनान में भी वही कहानी और वही चलन देख रहे हैं.”

पश्चिमी तट पर इसराइल का ‘ख़ामोश युद्ध’

ग़ाज़ा से दूर, इसराइली क़ब्ज़े वाले फ़लस्तीनी क्षेत्र पश्चिमी तट में फ़लस्तीनियों की गम्भीर स्थिति, वहाँ “पूर्ण दंडमुक्ति” के साथ चलाए जा रहे “ख़ामोश युद्ध” को भी उजागर करती है. वहाँ फ़लस्तीनी लोग, इसराइल के यहूदी बाशिन्दों (settlers) के बढ़ते हमलों का सामना कर रहे हैं.

ग़ौरतलब है कि जनवरी में, इसराइली बुलडोज़र, पूर्वी येरूशेलम में UNRWA मुख्यालय में घुस गए और वहाँ इमारतों को ध्वस्त कर दिया, जबकि यूएन परिसर के ऊपर इसराइली झंडा फहराया गया.  इसराइल के इस क़दम की, वैश्विक संगठन ने अन्तरराष्ट्रीय क़ानून के उल्लंघन के रूप में कड़ी निन्दा की.

(‘पूर्वी येरूशलम में, UNRWA के मुख्यालय में आगज़नी, यूएन पर असाधारण हमला’)

‘अत्यधिक दबाव’

दुनिया भर में जारी वैश्विक उथल-पुथल के बावजूद, जिनीवा में लज़ारिनी शान्त नज़र आते हैं. पिछले दो वर्षों में स्वयं पर और UNRWA पर हुए हमलों से “अत्यधिक दबाव” का सामना करने की बात स्वीकार करते हुए, वे अपने परिवार के समर्थन को एक प्रमुख कारण बताते हैं जिसकी वजह से वे काम जारी रख पाए.

फ़िलिपे लज़ारिनी कहते हैं, “मैं पिछले दो वर्षों में (परिवार के लिए) मौजूद नहीं रह पाया हूँ,” और दृढ़ता के साथ आगे कहते हैं कि एक बार जब वे UNRWA छोड़ देंगे, तो उनकी योजनाओं में अपनी पत्नी और बच्चों के साथ समय बिताना और एक ऐसी यूएन एजेंसी के प्रमुख के रूप में अपने अनुभवों के बारे में लिखना शामिल है जिसका भविष्य भू-राजनीति की दया पर निर्भर है.

Source : UN News

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